मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, July 30, 2011

जिन्दा फ़रिश्ते

जिन्दा फ़रिश्ते 

हैं जिन्दा फ़रिश्ते अभी घर में मेरे ,
मुझे मंदिर में जाने की जरूरत नहीं |

इनकी खुशामद ही मन से करूँ ,
पत्थरों को रिझाने की जरूरत नहीं |

बुतपरस्ती नहीं है गंवारा मुझे ,
माँ सी ज़माने में मूरत  नहीं |

वालिद का साया है सर पे मेरे ,
मुझे आशियाने की जरूरत नहीं  |

इनका रहम - ओ - करम है अगर ,
फिर गंगा नहाने की जरूरत नहीं |

खुद को खड़ा कर लूँ इनकी जगह ,
फिर किसी भी बहाने की जरूरत नहीं |


                                                           "प्रवेश "

No comments:

Post a Comment