मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, July 20, 2011

राजधानी - गैरसैण

राजधानी - गैरसैण

न आघिन न पछिन , न बौं में न देण में |
हमुकैं राजधानी चहिंछ गैरसैण में |

कब तक रहला जोगिक ड्यरम |
अब ऐ जाओ लौटि बे अपुण घरम |
सब करो कोशिश , एक पक्क घर बणन में |
हमुकैं राजधानी चहिंछ गैरसैण में |

घरौक मुंजन जब नहे जाल कुण पन |
को बाट बताल , कसी आघिन बढिल नन |
को थाव ल्युन सिखाल , को मध्हत को हिटन में |
हमुकैं राजधानी चहिंछ गैरसैण में |

आज तक दिल काके देखोछे काखिम |
खीनक चोप धरिबे देखोछे आँखिम |
दिल कें हिकौम धरो , असली ठिकाण में |
हमुकैं राजधानी चहिंछ गैरसैण में |


                                                          "प्रवेश "

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