मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, July 9, 2011

छत पर

छत पर 

आज मौसम बड़ा सुहाना है छत पर |

कुछ देर में उन्हें भी आना है छत पर |


भाँप ले कोई गर बेचैनी मन की |

तो समझे कोई दीवाना है छत पर | 


यूँ तो आहाते में काफी जगह है |

कपडे सुखाना , बहाना है छत पर |


जूड़ा खुलेगा और झटकेंगी जुल्फें |

काली घटा को भी छाना है छत पर |


पलक न झपकने की प्रतियोगिता है |

निगाहों में सारा ज़माना है छत पर |


सरगम सी घुल रही है हवा में |

आती - जाती साँसों का तराना है छत पर |


दोनों की पलकें झपकी हैं संग - संग |

जीतना किसे है , हार जाना है छत पर |


अच्छा जी अब उतरते हैं छत से |

कल इसी वक़्त वापस आना है छत पर |

                                                          "प्रवेश "

2 comments:

  1. Bhanp le gr koi bechaini mann ki,
    TOH sanjho koi diwana hai vhhat pr........
    wah ! pravesh ji ! sunder ! ati sunder....
    pahli baar aapke blomain aaya or chnd rachnayen padhi , achhi lagi...
    blog ka prachar- prasaar kijiyega,,

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  2. bhakuni ji.. nakaskar... blog me aapka swagat hai.. blog ke prachar ka jimma to aap jaise mitron ke kandhon par hai...

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