मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, June 22, 2011

एक मोल की दुकान

एक मोल की दुकान

 कभी देखी है 

एक मोल की दुकान !

यहाँ एक ही भाव मिलता है 

हर एक सामान |


हर ग्राहक के लिए 

एक ही भाव ,

भेद - भाव नहीं ,

सब एक समान |


लेकिन देखा है मैंने 

यहाँ नियम बदलते ,

पल - पल हर घडी ,

इंसान दर इंसान |


ग्राहक दर ग्राहक 

 बदलता व्यवहार ,

किसी को दुत्कार 

तो किसी को सम्मान  |


चेहरा बदलते ही 

भाव भी बदलते ,

लेकिन बाहर लिखा है ,

एक मोल की दुकान |


लोकतंत्र की तुलना दुकान से की गयी है |

                              "प्रवेश "


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