मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Sunday, May 22, 2011

लकीरें

लकीरें



किस्मत का फैसला करती हैं 
हाथों की लकीरें 
और बदकिस्मती भी तय 
ये लकीरें ही करती हैं |

दो हाथों की लकीरें 
एक तक़दीर से खेलती हैं ,
कभी संवार देती हैं उसे 
तो कभी बिगड़ देती हैं |
मगर दिलों में खिंची लकीरें 
दरारें बन जाती हैं ,
और चौड़ी होकर दरारें 
बन जाती हैं खाईयाँ |
खाई के दो हिस्से अगर 
कोशिश भी करें मिलने की ,
और बड़ी खाईयाँ 
बन जाती हैं नाकामी में |
और जब लकीरें खींचती हैं 
दो मुल्कों के बीच
तो बदकिस्मती शुरू 
हो जाती है आवाम की |
लकवा मार जाता है 
दोनों ही मुल्कों को ,
होंठ कहते नहीं , कान सुनते नहीं ,
आँखों के सामने भी धुंधलका सा होता है |
बातें होतो हैं तो 
सिर्फ तोपों और बंदूकों से ,
जिसमे झुलसकर दम 
तोड़ देती है इंसानियत |
मगर खिंची हुई लकीर को 
मिटाता नहीं कोई ,
एक बड़ी लकीर खींच देता है ,
पहली को छोटी करने को |

                                      "प्रवेश " 

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