मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, May 28, 2011

काश !

काश !


बड़ी तकलीफ होती है 
आज जब बेटा मुझसे 
दो दूनी पूछता है और 
मैं अपनी उँगली उसकी 
माँ की तरफ कर देता हूँ |
कभी दस रुपये के सामन के 
बीस भी दे आता हूँ |
बड़ी तकलीफ होती है 
जब कलाई पर घडी होते हुए भी 
दूसरों से समय पूछना पड़ता है |
लोगों के नाम के साथ - साथ 
मोबाइल में मैंने उनकी 
तस्वीर भी लगवा रखी है |
एक बटन दबाकर मुझे 
गाना चलाना तो आता है ,
पर जो गाना बजता है 
वही सुनना पड़ता है ,
क्योंकि मुझे गाना बदलना नहीं आता |
ठेकेदार मजदूरी के 
जो भी रुपये देता है ,
चुपचाप थाम लेता हूँ ,
अगर गिन पाता तो 
मजदूरी क्यों करता |
कभी समय निकालकर जब 
दुकान पर बैठता हूँ ,
तो मेरा बेटा भी साथ जाता है ,
मैं पंक्चर निकालता  हूँ और 
वो हिसाब लगाता है |
मुझे याद है जब पिताजी 
मुझे स्कूल छोड़ने जाते थे ,
मेरी तख्ती और दावात 
खुद ही ले जाते थे ,
पर गिल्ली - डंडा, 
गेंद - बल्ले के सिवाय कुछ 
सूझे तो स्कूल में रुकें |
पिताजी ने प्रलोभन भी दिया 
और डांट भी लगाई,
लेकिन मैं स्कूल की ओर
पीठ करके सोता था |
आज जब सर्वांग होते हुए भी 
खुद को लाचार पाता हूँ ,
तब सोचता हूँ 
काश ! मैंने पढ़ लिया होता |

                                           "प्रवेश"

Sunday, May 22, 2011

लकीरें

लकीरें



किस्मत का फैसला करती हैं 
हाथों की लकीरें 
और बदकिस्मती भी तय 
ये लकीरें ही करती हैं |

दो हाथों की लकीरें 
एक तक़दीर से खेलती हैं ,
कभी संवार देती हैं उसे 
तो कभी बिगड़ देती हैं |
मगर दिलों में खिंची लकीरें 
दरारें बन जाती हैं ,
और चौड़ी होकर दरारें 
बन जाती हैं खाईयाँ |
खाई के दो हिस्से अगर 
कोशिश भी करें मिलने की ,
और बड़ी खाईयाँ 
बन जाती हैं नाकामी में |
और जब लकीरें खींचती हैं 
दो मुल्कों के बीच
तो बदकिस्मती शुरू 
हो जाती है आवाम की |
लकवा मार जाता है 
दोनों ही मुल्कों को ,
होंठ कहते नहीं , कान सुनते नहीं ,
आँखों के सामने भी धुंधलका सा होता है |
बातें होतो हैं तो 
सिर्फ तोपों और बंदूकों से ,
जिसमे झुलसकर दम 
तोड़ देती है इंसानियत |
मगर खिंची हुई लकीर को 
मिटाता नहीं कोई ,
एक बड़ी लकीर खींच देता है ,
पहली को छोटी करने को |

                                      "प्रवेश " 

Wednesday, May 18, 2011

परमानेंट स्टाफ

परमानेंट स्टाफ 

क ने ख से कहा एक दिन ,
क्यों देर से आते आप हैं ?
ख ने कहा नादान हो तुम ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

देर से आना , जल्दी जाना ,
शान हमारी बढती है ,
इससे परमानेंट होने की 
पहचान हमारी बढती है |

हम एक दिन काम पे न भी आयें ,
सात खून हमारे माफ़ हैं ,
तुम दैनिक मजदूरी वाले ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

एक साल में नहीं कमा 
पाते हो मजदूरी से जितना ,
एक महीने में ही मजे से 
पाते हैं हम वेतन उतना |

ये पिछले पुण्य हमारे हैं ,
पिछले ही तुम्हारे पाप हैं ,
इसीलिये तुम दैनिक हो ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

सुनकर ख की बात ,
क ने चुप्पी साध ली ,
चुपचाप लग गया काम में ,
शिकायत की गठरी बाँध ली |

मजदूरी से बच्चे पालेगा,
 छः बच्चों का बाप है ,
इनका भला क्या जाता है ,
ये तो परमानेंट स्टाफ है |

                                       "प्रवेश"

Saturday, May 14, 2011

परीक्षा परिणाम


परीक्षा परिणाम 

आजकल गोलू मंदिर जाता ,
कभी न मंदिर जाने वाला |
गुप्त सूत्रों से पता चला है ,
परीक्षा परिणाम है आने वाला |

सुबह - शाम एक -एक घंटा ,
मंदिर में बिताता है |
माथा टेकता, मिन्नत करता ,
भजन भी जोर से गाता है |

लौटता है जब घर को ,
तो ये बात अवश्य कह आता है ,
भगवन ! गणित में पास करा दे ,
भला तेरा क्या जाता है |

कल रात अक्ल की देवी ,
गोलू के सपने में आई ,
गणित के पेपर से पहले की
सारी मस्ती याद दिलाई |

बोली वत्स ! उस दिन तू अगर ,
कनौट प्लेस नहीं जाता ,
एक घंटा और पढता ,
दो प्रश्न और हल कर आता |

मक्खी का दशमलव भी ,
वहीँ पर काम आता है ,
जहाँ पूरा प्रश्न
विधिवत हल किया जाता है |

                                              "प्रवेश"

Tuesday, May 10, 2011

पानी और शराब

पानी और शराब 

अजी ! खाली दिमाग 
शैतान का घर ,
यूँ ही बैठे -बैठे 
खयाल आ गया |

दोनों ही तरल 
और पेय हैं ,
फिर भी दोनों में 
भेदभाव किया जाता है ,
शराब तो पी जाती है ,
जबकि पानी पिया जाता है |

फिर खयाल आया कि
पानी से कोई
 बहकता नहीं ,
पानी पीकर ना ही
 बना है कभी ,
पानी पीकर कोई 
घर उजड़ता नहीं |
शराब से ज्यादा
 जरूरी है पानी ,
फिर भी पानी की
 किसी को लत नहीं |

कई गुना कम कीमत है 
एक बोतल पानी की ,
इसीलिये पानी की 
क़द्र भी नहीं की जाती है ,
अब समझ में आया,
क्यों पिया जाता है पानी ,
और शराब क्यों पी जाती है |

                                                "प्रवेश"

Saturday, May 7, 2011

कभी - कभी

कभी - कभी 

जिनके नाम से चलती थी साँसे ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

जिनके दीदार से होती थी सुबह ,
जिनकी आगोश में गुजरता था दिन ,
जिनके नाम से ढलती थी शाम ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

कभी जिनको हमने खुदा माना अपना ,
और सदा सर- आँखों पर बिठाया ,
कभी जिनके संग में खायी थी कसमें,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

हमने सदा ही ख़ुशी चाही जिनकी ,
साया कभी गम का पड़ने दिया ना,
इतना बड़ा गम दिया है जिन्होंने ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

हमको पता न हमारी खता का ,
फिर भी उन्होंने सजा हमको दी है ,
कभी जिनकी राहों के काँटे चुगे थे ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

अब एक ख्वाहिश है ग़मगीन दिल की ,
और हम यही माँगते हैं खुदा से ,
कभी हम भी जाएँ ख्यालों में उनके ,
जो कभी - कभी हमारे ख्यालों में आते हैं |

                                                        "प्रवेश"

कभी - कभी का मतलब अक्सर नहीं बल्कि बहुत कम (rare ) है | 

Wednesday, May 4, 2011

पिता हूँ मैं !

पिता हूँ मैं !

बचपन में बहन की हत्या का 
कारण बना दिया मुझको ,
कोई जुर्म नहीं किया,
मुजरिम अकारण बना दिया मुझको |

दादी माँ को नारी होकर 
पोती से है रोष बड़ा ,
इसमें मेरा, पिताजी और
 दादाजी का दोष है क्या ?

बड़ा हुआ तो दहेज़ का झोला 
मेरे कंधे पर टांग दिया,
जो बड़ी बहन को दिया,
वही छोटी ने भी मांग लिया |

दिन भर मेहनत - मजदूरी से
जो भी कमाकर लाता हूँ ,
एक निवाला कम खाता हूँ ,
पर बच्चों को पढ़ता हूँ |

बच्चों की कलम - दावात की खातिर 
एक चाय नहीं पीता हूँ मैं ,
बाकी समाज से गिला नहीं,
कवियों से उपेक्षित पिता हूँ मैं |

जब बच्चे तकलीफ में होते हैं,
मैं भी तकलीफ में होता हूँ ,
माँ तो आँसू बहा ले लेकिन   
मैं दिल ही दिल में रोता हूँ |

ये  बच्चे जीते हैं मुझमे ,
इन बच्चों में जीता हूँ मैं ,
बाकी समाज से गिला नहीं,
कवियों से उपेक्षित पिता हूँ मैं |

कवियों को लगता है मुझे
बच्चों और समाज की फ़िक्र नहीं,
इसीलिए किसी रचना में,
मेरा कोई जिक्र नहीं |

बच्चों और समाज की चिंता में 
भूसे की जलती चिता हूँ मैं,
बाकी समाज से गिला नहीं,
कवियों से उपेक्षित पिता हूँ मैं |


                                                   "प्रवेश"