मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, April 28, 2011

साम - दाम - दण्ड - भेद

साम - दाम  - भेद - दण्ड

सर्वोत्तम उपाय राजनीति में 
बतलाया है साम ,
लेकिन इस उपाय से 
अब कहाँ बनते हैं काम !

साम वहाँ अपनाया जाता ,
जहाँ समझदारी हो ,
वहाँ भला किस काम का 
जहाँ समझ ही भारी हो !

दाम को बताया गया दूसरा उपाय ,
घर बुलाओ  किसी को पीने चाय ,
दे दो उसे मुंह माँगा दाम ,
कौन रोक सकता है फिर आपका काम !

यूँ तो दाम से ही बन जाते हैं काम ,
न बने तो तनिक भी न कीजिये खेद ,
बदलिये दल और निकालिये काम ,
बचाइये दाम और दीजिये भेद |

चौथे उपाय की तो बात ही न कीजिये 
दण्ड कौन भला राजनेताओं को देता है !
कभी चले भी जाएँ अगर स्पेशल जेल ,
तो प्रशासन उन्हें तमाम सुविधाएँ देता है |
                                                                            
                                                                              "प्रवेश" 

No comments:

Post a Comment