मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, April 18, 2011

सर्वोपरि माँ

सर्वोपरि माँ 

चाहे अमृत पान किया हो ,
चाहे खायी रसमलाई ,
सब कुछ ही बेकार है ,
जब तक माँ की डांट न खायी |

चाहे आलीशान भवन और 
सारी सुख - सुविधा हो जुटाई,
सब कुछ ही बेकार है अगर 
माँ के आँचल की छाँव न पाई |

चाहे दान किया हो लाखों ,
चाहे स्वर्ण नगरी हो बसाई ,
सब कुछ ही बेकार है अगर 
माँ के मन को ठेस लगाईं |

चाहे चारों धाम नहाये ,
चाहे धूनी - भस्म रमाई ,
सब कुछ ही बेकार है अगर 
माँ की क़द्र नहीं की भाई |

चाहे शीश नवाया प्रभु को ,
चाहे कीर्तन - भजन कराई ,
सब कुछ ही बेकार है ,
माँ को अगर न धोक लगाई |

                                             " प्रवेश "

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