मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, April 6, 2011

ग़ुरबत

ग़ुरबत 

सब कुछ दाँव पर लगा बैठे ,
थोडा बहुत पाने को ,
कुछ भी हासिल कर न पाये,
सब कुछ भी खोने से |

दास्तान - ए - ग़ुरबत 
बयाँ भी  कैसे करें,
पसीजते नहीं अब दिल ,
फूट -फूट कर रोने से |

शेर के साथ - साथ 
सियार भी शिकारी हो गए ,
जान के लाले पड़े हैं ,
भागते मृगछौने से |

जहर पीकर सोते हैं तो
आँख खुल जाती है सुबह ,
आँख नहीं खुलती है ,
दवा पीकर सोने से |

भ्रष्ट शासन में हमारी 
हालत सुधर सकती नहीं ,
चाहे कर लो कोशिशें ,
खेतों में सोना बोने से |

                                           "प्रवेश"

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