मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, March 31, 2011

शादी कर लें

शादी कर लें 

खुद ही डाल 
पैरों में बेडी
खुद की नीलाम
आजादी कर लें ,
वे चाहते हैं ,
हम शादी कर लें |

कैसे स्वछन्द से 
नजरबन्द हो जायें ,
समय पर आना -जाना ,
उठना -बैठना, सोना  - जागना ,
कैसे इतने पाबन्द हो जायें !
कैसे खुद को गुलाम ,
उन्हें शहजादी कर लें !
वे चाहते हैं ,
हम शादी कर लें |

आज हम मालिक हैं 
अपनी मर्जी के ,
कैसे बंदिश में 
रहेंगे किसी के !
गैर - मियादी छूट को 
कैसे भला मियादी कर लें |
वे चाहते हैं ,
हम शादी कर लें |

                                      "प्रवेश"

Monday, March 28, 2011

वक़्त नहीं लगता

वक़्त नहीं लगता 

वक़्त गुजरते , वक़्त नहीं लगता |

लग जाते हैं बरसों , 
शिखर तक पहुँचते,
शिखर से उतरते , वक़्त नहीं लगता |

कल की ही बात है ,
हम दोस्त हुआ करते थे ,
रिश्ते बदलते, वक़्त नहीं लगता |

किसके वश में भला 
चाहना , न चाहना !
दिल को मचलते , वक़्त नहीं लगता |

यूँ सरेआम न 
इशारा किया कीजिये ,
लोगों को समझते , वक़्त नहीं लगता |

आज नाकारा हैं ,
तो ठुकराओगे हमें !
तकदीरें बदलते , वक़्त नहीं लगता |

अब कुछ भी कहने की 
गुंजाइश ही नहीं है , 
इरादा बदलते , वक़्त नहीं लगता |

(राजनीति से )

कर लो जतन
कल की खातिर ऐ गद्दारो,
तख्ता पलटते , वक़्त नहीं लगता |

                                                    " प्रवेश" 

Saturday, March 26, 2011

प्रेम अम्बर का धरा से

प्रेम अम्बर का धरा से

प्रेम अम्बर का धरा से 
ताकना दिन- रात ऐसे,
मूक संकेतों से करते 
हैं परस्पर बात जैसे |

रात में रोता गगन है ,
दिवस में तपती धरा है ,
मिलन हो सकता है नहीं ,
कैसी प्रेम की परंपरा है !

धीर- धारिणी पवन मार्फ़त 
भेजती सन्देश नभ को ,
गरजकर व्याकुल गगन,
कर देता है खबर सबको |

देखना बस दूर से 
पर मिल नहीं पाना परस्पर ,
सोचिये , कैसी विकट स्थिति 
झेलते हैं दोनों अक्सर |

है कोई उदहारण 
धरती - गगन के प्रेम जैसा ?
कई प्रेम - प्रसंग देखे ,
देखा कभी न प्रेम ऐसा |

                                      " प्रवेश" 

Thursday, March 24, 2011

बछिया की फ़िक्र

बछिया की फ़िक्र 

नयी ख़ुशी घर आने को थी ,
गाय दोबारा ब्याने को थी ,
सबने बछड़े की आस लगाई ,
इस बार भी बछिया ही आई |

सबको ही बछिया की फ़िक्र ,
कैसे निजात मिले ये जिक्र ,
इसकी कीमत कौन लगायेगा ,
कोई मुफ्त भी न ले जायेगा |

जब बछिया बड़ी हो जायेगी ,
और घर से बाहर जायेगी ,
छूटे सांड गली में फिरते ,
कैसे लाज बचायेगी |

अगर मिल गयी आँख किसी से ,
और जुड़ गयी काँख किसी से ,
खुद तो ये बदनाम होगी ,
घर की इज्जत नीलाम होगी |

घर वालों को कौन बताये ,
कैसे कोई उन्हें समझाये,
गायें ही बछड़े जनती हैं ,
बछिया ही गायें बनती हैं |

                                             "प्रवेश"

Tuesday, March 22, 2011

श्वान - तंत्र

श्वान - तंत्र

कुत्तों की सभा में तय हुआ ,
जब राज हमारा आयेगा,
तब कोई कुत्ता , कुत्ते की
मौत न मारा जायेगा |

किस दिन हो चुनाव , कब दें 
अंजाम चुनावी दंगल को ,
ये तय हुआ मतदान 
कराया जाये आगामी मंगल को |

"कुत्ता कल्याण संगठन " से 
टॉमी लंडूरा खड़ा हुआ ,
"कुतिया बचाओ संघ" से 
जबरू भूरा खड़ा हुआ |

टॉमी को चुनाव चिह्न मिला 
एक आँख का बिल्ला ,
जबरू चले प्रचार को ,
लेकर भौंकता पिल्ला |

टॉमी - पंथी और जबरू - पंथी 
लग गए प्रचार में ,
तू - तू , मैं -मैं , झड़प हुई 
टॉमी - जबरू के वार में |

खुजली वाले कुत्तों की गली में 
जब टॉमी जी आये ,
देख उधडती चमड़ी उनकी 
थोड़ा मुँह पिचकाये |

बोले आपकी गली में 
चिकित्सा शिविर लगायेंगे ,
निःशुल्क दवा खुजली की मिलेगी 
सब चंगे हो जायेंगे |

अगले दिन जबरू भूरा जी 
उसी गली में आये ,
सभी कुत्तों के लिये
खुजली की दवा साथ में लाये |

खुजली वाली गली में 
जबरू की जय -जयकार हुई ,
ताज्जुब , उसी गली से 
जबरू जी की हार हुई |

सारे खुजली वालों ने 
बेदुम टॉमी को वोट दिये,
जबरू जी ने दवा बाँटी
टॉमी जी ने नोट दिये |

जबरू विपक्ष में विराजे 
टॉमी जी बैठे गद्दी में ,
टॉमी - पंथी , जबरू - पंथी 
बिके नहीं फिर रद्दी में |

                                  "प्रवेश"

Saturday, March 19, 2011

जिन्हें जल्दी थी

जिन्हें जल्दी थी 

कुछ बुरे गये, कुछ भले गये,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गये |

कुछ दूर हमारे साथ चलें ,
अरमान ये दिल में पले गये ,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गए |

जो ख्वाब जुड़े थे संग उनके ,
कुछ भून दिए , कुछ तले गये ,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गये |

हालात , वक़्त और रब ने हमको ,
जिस रूप में ढाला, ढले गये ,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गये |

लौट आने की आस में उनकी ,
जलने लगे और जले गये ,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गये |

जल्दी जाने की होड़ में हम ,
वक़्त के हाथों मले गये ,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गये |

                                            "प्रवेश "

Thursday, March 17, 2011

प्रलय में प्रेम

प्रलय में प्रेम 

कभी सुनामी दहलाती ,
कभी भूकंप से काँपती ,
आज धरा की हालत देखो ,
चोट खाये साँप सी |

आबोहवा नापाक हुई ,
भर चुकी अधर्म की गगरी ,
इक दिन तो कटना ही था ,
कब तक खैर मनाती बकरी !

ऐसा कोई संयंत्र नहीं ,
जो झेल सके प्रकृति का कोप ,
न ही मिसाइल काम आएगी ,
न ही काम आएगी तोप |

हर पल हँसकर , मिलकर जी लो ,
सब अपने हैं , कोई गैर नहीं ,
जाने क्या कल अपनी बारी हो ,
जापान से कोई बैर नहीं |

स्वच्छ गगन सा निर्मल हो मन,
क्यों हो कुहरा , धुंध का पहरा ,
नफरत के धब्बे धुल जायें ,
चढ़े अमिट प्रेमरंग गहरा |
                                            "प्रवेश"

Wednesday, March 16, 2011

गर्मी में सूरज

गर्मी में सूरज 

कल तक था जो प्यारा,
आज बन गया अंगारा |

कल तक जल्दी जाता था ,
आजकल देर से भागता है ,
कल तक खूब सोता था ,
आजकल मुझसे पहले जागता है |

जाड़ों में तू सिर पर बैठे ,
तो भी सर्दी लगती है ,
आज दूर से तेरी सूरत ,
बड़ी बेदर्दी लगती है |

जब तक भोली जनता सा था ,
सबका चहेता बन बैठा ,
आज जरा मौसम क्या बदला ,
तू भी नेता बन बैठा !

याद रख , जब सत्ता की तरह ,
मौसम भी बदल जायेगा ,
उतर जाएगी सारी गर्मी ,
तू भी ठंडा पड़ जायेगा |

तू भी ठिठुर जायेगा ,
जब गर्मी बेदर्दी जायेगी ,
तू भी कोट सिलवायेगा ,
जब वापस सर्दी आयेगी 

                                           "प्रवेश"|

Sunday, March 13, 2011

होली के गीत

होली के गीत 

आज तो बनते हैं 
फिरंगी बोली के गीत ,
कौन लिखता है भला 
अब होली के गीत !

सुनने की खातिर 
कहाँ बनते हैं गाने ,
जो बनते हैं वो 
केवल जिस्म दिखने ,
अब तो बनते हैं 
घाघरा - चोली के गीत ,
कौन लिखता है भला 
अब होली के गीत !

रंग - गुलाल और 
पानी के गाने ,
कान्हा के संग 
राधा रानी के गाने ,
गोपियों के संग 
हमजोली के गीत ,
कौन लिखता है भला 
अब होली के गीत !

मिलना कई 
यारों से पुराने ,
वो घर - घर जाना 
गुलाल लगाने ,
यारों की महफ़िल 
हँसी - ठिठोली के गीत ,
कौन लिखता है भला 
अब होली के गीत !

                                 "प्रवेश" 


Friday, March 11, 2011

'मैं ' में 'खुद '

'मैं ' में 'खुद '

दुनिया की इस भीड़ में 
अपने वजूद को ढूंढता हूँ ,
'मैं ' में 'खुद ' को ढूंढता हूँ |

टटोलता , खंगालता 
सब में मौजूद को ढूंढता हूँ ,
'मैं ' में 'खुद ' को ढूंढता हूँ |

धूप - छाँव में एक सा ,
फक्कड़ अवधूत को ढूंढता हूँ ,
'मैं ' में 'खुद ' को ढूंढता हूँ |

दंभ , कपट और द्वेषकाल में ,
नव प्रेमयुग को ढूंढता हूँ ,
'मैं ' में 'खुद ' को ढूंढता हूँ |

                                          " प्रवेश"

Tuesday, March 8, 2011

मुसाफिर

मुसाफिर

गिरता - संभलता .. नादान मुसाफिर ,
अनजानी राहों पर...अनजान मुसाफिर |

महज एक निवाले की जद्दोजहद में ,
उड़ने को बेताब.... बेजान मुसाफिर |

बेचैन भीड़ में ... सुकून तलाशता ,
ग़मों से लबरेज .....दिलशान मुसाफिर |

सोने - चाँदी की चमक से चकाचौंध ,
दौलत से रौशन.... वीरान मुसाफिर |

उमड़ता - घुमड़ता.... तूफ़ान मुसाफिर ,
चंद घडी का ... मेहमान मुसाफिर |

                                                     "प्रवेश"

Saturday, March 5, 2011

आह्वान

आह्वान 

चाहे हो भगवा , पीताम्बर 
चाहे पहनी खाकी हो ,
चाहे खादीदारी  हों 
या महज लंगोट ही बाकी हो |

चाहे सभाएं करो नित्य ,
चाहे बन्दूक या कलम उठा लो ,
शांत रहो या रौद्र बनो ,
कैसे भी हो , देश बचा लो |

यज्ञ कराओ , हवन कराओ ,
गद्दारों का दहन कराओ ,
भ्रष्टों की आहुति चढ़ाकर,
अपना प्यारा वतन बचाओ |

एक नहीं , सब तैयार हों ,
क्यों मुहूर्त का इन्तजार हो ,
हफ्ते में दिन सात ही क्यों ,
आठवाँ दिन "क्रांतिवार " हो |

                                              "प्रवेश"

Friday, March 4, 2011

मार्च पाँच


  • मार्च पाँच 

    कितने  ग्रीष्म 
    कितने  शिशिर,
    देख चूका हूँ 
    मैं अब  तक !

    कितने हेमंत ,
    कितने शरद 
    झेल चूका हूँ
     मैं अब तक!

    कभी - कभी
    लगता है
    आये सौ बसंत
    हैं एक साथ |

    कभी टूट पड़े
    पतझड़ सहस्त्र 
    देने मेरी
    हिम्मत को मात |

    कभी सूखा
    कभी सावन
    करते मेरे
    धैर्य की जाँच |

    उम्र बढाता
    आयु घटाता
    हर वर्ष आता
    मार्च पाँच |
                                  "प्रवेश "

Thursday, March 3, 2011

है कोई ?

है कोई ?

फूहड़ और बाजारू ,
गाने वाले कई हैं ,
वीरों का गुणगान करे ,
है कोई उस्ताद ?

प्रस्तुतकर्ता कई हैं ,
दिगम्बर बालाओं के ,
है कोई ? प्रस्तुत करे ,
जनमानस का अवसाद |

चाटते दीमक कई हैं ,
राष्ट्ररूपी वृक्ष को ,
है कोई ? पोषण करे ,
जो बन उर्वरा खाद |

हैं कई , झण्डा गगन में
गाड़ दें जो जीत का,
है कोई ? जो हार का
भी कर रहा उन्माद |

है कोई ? जी जान से 
मेहनत करे मैदान में ,
कई विज्ञापन पड़े हैं ,
हैं कई उत्पाद |
                              " प्रवेश" 

Tuesday, March 1, 2011

अगर आसमां में

अगर आसमां में

अगर आसमां में मैखाने होते ,
हर पाइप के नीचे पैमाने होते |

बादल भी मय लेकर बरसते ,
तरसते न मय के दीवाने होते |

सरकार भी भला क्या कर लेती ?
न पुलिस को देने हर्जाने होते |

मुफ्त ही घर में मुहैया हो जाती ,
न ठेके के चक्कर लगाने होते |

मूड बनाते कभी भी, कहीं भी ,
बनाने न सौ - सौ बहाने होते |

मोहतरमा से जूझते क्यों भला ,
पीते शान से , सीना ताने होते |

मय भी पानी की सूरत में होती ,
शराब बचाओ अभियान चलाने होते |

                                                      "प्रवेश "