मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, January 14, 2011

सोचो ! अगर गोल न होता ?

गोल

सूरज सदा उगा रह जाता,
चाँद कभी वापस न आता,
सोचो ! अगर गोल न होता ?
 
एक कभी दस बन नहीं पाता,
एक में भला क्या -क्या आता?

तबला न होता, ताल न होती,
बन्दूक में भी नाल न होती,

पानी के लिए नल न होता,
और हर घर में जल न होता,

स्पेन फुटबौल में हार ही जाता,
इंग्लैंड हौकी में पार न पाता,

सड़क न होती, पटरी न होती,
बरसात के लिए छतरी न होती,

खाने को न थाली होती,
होती भी तो खाली होती,

तब कोई विमान न होता,
गाड़ी का अभिमान न होता,

न तो सिगरेट, बीडी होती,
फ्लौपी और न सीडी होती,

घडी की घूमती सुई न होती,
शाम से सुबह हुई न होती,

टीवी की केबल न होती,
टेनिस की टेबल न होती,

क्रिकेट, वोलीबाल न होता,
फिक्सिंग का  बवाल न होता,

बिना आँख के किसको दिखता?
बिना कलम के मैं क्या लिखता?

सारा जग वीरान होता,
आज कहाँ इंसान होता?
सोचो ! अगर गोल न होता ?
                  
                                                                                                                           प्रवेश

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