मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, December 29, 2011

जज्बा जरुरी है


जज्बा जरुरी है 


हाथ पर न हाथ धर देखो जमाने को 

मशाल तो बदलाव की लहू से जलती है |


सौ बार गिर जाओ मगर हिम्मत नहीं हारो 

दुनिया तो हिम्मत वालों के क़दमों पे चलती है |


जज्बा नहीं जिनमे कि कुछ कर के गुजर जायें 

दिन ख्वाबों में कटता है , शाम ख्वाबों में ढलती है |


उतर जाते हैं जो मैदान में , बाँधे कफ़न सर पर 

संग उनके हमेशा जिंदगी और मौत टहलती है |


खूबसूरती तारीफ का मुद्दा नहीं यारो 

तारीफ खुशदिल लोगो की दिल से निकलती है |


                                              "प्रवेश " 

Wednesday, December 28, 2011

हाइकु -छत्तीस गुण


छत्तीस गुण 



छत्तीस गुण 

मेल खाती कुण्डली 

फिर तलाक |


                        "प्रवेश " 

Tuesday, December 27, 2011

प्यारी सी मुस्कान


प्यारी सी मुस्कान

कीमत क्या इसकी, तू जान भी ले लेना 

बदले में प्यारी सी मुस्कान देना |


बड़े काले चेहरे नकाबों में फिरते 

गैरों में अपनों को पहचान लेना |


पीछे हटें न कदम बढ़ जो जाएँ 

आगे ही बढ़ना है , ये ठान लेना |


मेहनत तुम्हारी और रहमत खुदा की 

किसी का न सर पे तू  अहसान लेना |


यकीं ना रहे जब दुआओं पे खुद की 

तो आकर मेरा हाल भी जान लेना |


                                        "प्रवेश " 

Monday, December 26, 2011

हाइकु - घना कोहरा


हाइकु - घना कोहरा




                                            ठण्डा अलाव 

                                             सिसकते बदन 

                                             घना कोहरा |


                                                                               "प्रवेश " 

Saturday, December 24, 2011

हाइकु -मासूम बच्चा


हाइकु-मासूम बच्चा




वजनी बस्ता 

अपार अपेक्षायें 

मासूम बच्चा |


                "प्रवेश " 

Tuesday, December 20, 2011

हाइकु - दहेज़


हाइकु - दहेज़ 


पीला रंग ही 

हाथ रंगने हेतु 

काफी  नहीं  है |


घुलता नहीं 

खून पसीने बिन 

ये रंग यारो |


दहेज़ लेते 

पढ़े - लिखे गँवार 

झिझके  बिन |


अमीर खुश 

गरीब ही बेहाल 

औ तंग यारो |


                 "प्रवेश " 

Monday, December 19, 2011

हाइकु -माँ और मोटरसाइकिल


हाइकु -माँ और मोटरसाइकिल




एक हफ्ते से 

बिस्तर पर पड़ी 

खाँसती माता |


न दवा दारू 

मीठे बोल भी नहीं 

वक़्त न मिला |


थोड़ी आवाज 

मोटरसाइकिल 

करने लगी |


उसी पल ही 

ठीक करवा लाये 

मैकेनिक  से |

                             "प्रवेश "

Wednesday, December 14, 2011

हाइकु - तुम्हारी अदा


हाइकु - तुम्हारी अदा


वो चल देना 

जुल्फें झटककर 

तुम्हारी अदा |


टेढ़ी मुस्कान 

सुर्ख अधरों पर

तुम्हारी अदा |


नागिन चोटी 

बलखाती कमर

तुम्हारी अदा |


वो चंचलता 

बिखराती नजर 

तुम्हारी अदा |


पलटकर 

कभी देखो इधर 

कर लो  खता |


कभी दिल में 

देखो उतरकर 

हमारी अदा |

                          "प्रवेश "

Monday, December 12, 2011

हाइकु - सर्दी की सुबह


हाइकु - सर्दी की सुबह 



कँपाती भोर 

ठिठुरता सूरज 

सिकुड़ा हुआ |


हटा कोहरा 

चमकती किरणें 

शीतल घाम |


आधी नींद से 

जग उठी दुनिया 

अंगडाई सी |


                            "प्रवेश "

Friday, December 2, 2011

जरा संभल के !


जरा संभल के !

ऐ भोली - भाली चींटियों !

जरा संभल के,

यूं बेधड़क

पार न किया करो 

इस रास्ते को,

बरामदे में भी 

एक किनारा पकड़ लो

अपने आने - जाने के लिये |

माना कि

तुम्हारा भी हक है 

बेरोक - टोक 

सीना ताने 

इस रास्ते पर चलने का ,

मगर तनिक खयाल रखो 

अपने छोटे कद का 

और कतई न भूलो 

इस बात को कि 

यहाँ हर कोई 

नजरें झुकाकर नहीं चलता,

हर एक की नजर

जमीन पर नहीं है |

                                     "प्रवेश "

Monday, November 28, 2011

गर्व या ग्लानि !


गर्व या ग्लानि !


ये ईंट

जिस पर दिया जलाकर 

दबा दी गयी है , 

जमीन की सतह से 

दो गज नीचे ,

जिस पर बनना है 

तुम्हारे सपनों का महल |


इसे ग्लानि हो 

इस बात की 

कि जब चर्चा हो 

आपके आशियाने की,

और इसकी खूबसूरती की ,

इसकी बनावट की ,

तब इसका

कोई जिक्र न होगा ,

इसके बलिदान को 

कोई याद नहीं करेगा |


या 

गर्व महसूस करे 

कि कल

जो आलीशान इमारत 

तैंयार होगी इसकी पीठ पर,

जिसकी सुन्दरता की कहानी 

इतिहास रचेगी ,

उसके चिरंजीवी होने का 

श्रेय इसी ईंट को मिलेगा |

                                    "प्रवेश "

Friday, November 25, 2011

उसे तो बस लिखना है |


उसे तो बस लिखना है |

बिजली के झूलते तारो पर 

तपती लू के अंगारों पर 

नदिया के बहते धारों पर 

उसे तो बस लिखना है |


पराजित या विजेता पर 

अच्छे या बुरे नेता पर 

मानवता के प्रणेता पर 

उसे तो बस लिखना है |


जनता के उठते हाथों पर 

जनता पर पड़ती लातों पर

सरकारी चुपड़ी बातों पर 

उसे तो बस लिखना है |


संसद के संवादों पर 

झूठे सरकारी वादों पर 

गुणों पर और अपवादों पर 

उसे तो बस लिखना है |


पेड़ों से लटकते झूलों पर 

कागज़ पर जमती धूलों पर 

आगे - पीछे की भूलों पर 

उसे तो बस लिखना है |


कुदरत के अद्भुत रंगों पर 

भूखे प्यासों और नंगों पर

पल - पल होते दंगों पर 

उसे तो बस लिखना है |


दीवानों की चाहत पर 

वफ़ा पर और बगावत पर 

टूटे और दिल आहत पर 

उसे तो बस लिखना है |


प्रेमीजन की बातों पर 

धवल चाँदनी रातों पर

खुशियों पर , सौगातों पर 

उसे तो बस लिखना है |


उस पर किसी का जोर नहीं 

उसकी सोच का कोई छोर नहीं 

वो पक्ष - विपक्ष की ओर नहीं 

वो कवि है , रिश्वतखोर नहीं

उसे तो बस लिखना है |


                                "प्रवेश "

Wednesday, November 16, 2011

काश ! कि बचपन लौट के आता |


काश ! कि बचपन लौट के आता |


काश ! कि बचपन लौट के आता |

मैं फिर से बच्चा बन जाता |

काश कि बचपन लौट के आता |


कोई मुझको डांट लगाता ,

तो झट बाबा को बतलाता |

बाबा डांट लगाते जब तो ,

माँ के आँचल में छिप जाता |


मैं बस मेरे मन की करता ,

वश तो किसी का  चल नहीं पाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


खेलता अपने ही साये से ,

तरह - तरह के नक्श बनाता |

कभी कूदता , कभी उछलता ,

हँसता कभी , कभी रूठ भी जाता |


कभी कृष्ण तो कभी सुदामा ,

और कभी राधा बन जाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


राग - द्वेष न पास  फटकता,

दंभ - कपट न मन में होता |

ईर्ष्या - छल का ज्ञान न होता ,

न पापी भाव जहन में होता |


बच्चों में भगवान  सुना  है  ,

और मैं भी भगवन बन जाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


सब अपने , अपने ही होते ,

कोई भी तब गैर न होता |

सारे मन के मीत ही होते ,

और किसी से बैर न होता |



केवल प्रेम की भाषा होती ,

नफरत क्या है , जान न पाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |

                                             

                                                        "प्रवेश "