मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, December 17, 2010

आस -पास आजकल

आस - पास आजकल 
समय तेरी ही बलिहारी है,
हर ओर तेरी जयकारी है,
ऊँच -नीच और भेदभाव 
अब एक यही महामारी है |

सारा पैसे का खेल है , 
ब्याज कमीशन का ही मेल है , 
चलती का नाम तो गाड़ी था,
पर रूकती भी अब रेल है |

'चाय - पानी' ' घूस' का नाम है,
बेईमानी का ईनाम है ,
हाथ में सबके छुरी है ,
बगल में सबके दाम है |

रुपये की गुलामी होती है , 
दिन - रात सलामी होती है ,
अच्छी रकम लगाये कोई ,
बेटे की नीलामी होती है |

कपड़े की मिलें बदहाल हुई ,
इसमें किसकी क्या चाल हुई ?
ये तो साफ़ दिखाई पड़ता है,
चुनरी घटकर रूमाल हुई |

हालात बहुत ही बैड हुए ,
जीते जी पापा डैड हुए ,
खबर किसी को दे दो तो ,
पाओगे सबको  सैड  हुए |

हर रोज यहाँ नए दंगे हैं ,
आधे से ज्यादा नंगे हैं ,
पूरे भी नंगे होवें तो ,
नेता तो फिर भी चंगे हैं |

घर - घर में है संग्राम छिड़ा , 
राधा से अब तो श्याम लड़ा ,
राम - रावण तो लड़े ही थे ,
अब लक्ष्मण  से भी राम लड़ा |

कांटे ये दुनिया बोती है ,
काटते वक़्त क्यों रोती है ?
होनी का नामोनिशान नहीं ,
बस अनहोनी ही होती है |

वेदों को रट डाला है ,
पुराणों को पढ़ डाला है ,
जाने क्या - क्या पढ़ चुके हैं,
लेकिन अक्ल पर फिर भी ताला है |

पैसे वालों के नौकर  हैं ,
 अपने तो केवल दो कर हैं ,
नौ - कर वालों की मौज यहाँ ,
दो - कर वालों पे सौ -कर हैं |
                                                                                                                  प्रवेश

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